नबी करीम सल्लल्लाहु तआला अलैही वस्सलम के भूलने में हिक़मत

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*🥀 नबी करीम सल्लल्लाहु तआला अलैही वस्सलम के भूलने में हिक़मत 🥀*



*मैसेज नम्बर-: 1️⃣0️⃣*

📃हज़रत अबहुरेरा रज़ियल्लाहु अन्हु से मरवी है बेशक़ नबी करीम सल्लल्लाहु तआला अलैही वसल्लम नमाज़ की तरफ निकले जब आपने तकबीर कही तो फिर गए और लोगों की तरफ़ इशारा किया कि वह अपनी जगह ठहर जाएं आप मस्जिद से निकल गए आपने ग़ुस्ल फ़रमाया फिर तशरीफ़ लाये आप के सर से पानी के क़तरे टपक रहे थे आपने नमाज़ पढ़ी जब नमाज़ पढ़ ली तो आपने फ़रमाया बेशक़ मैं हालते जनाबत में था ग़ुस्ल करना भूल गया था !
📖इस हदीस पाक की शरह में मुल्ला अली कारी रहमतुल्लाह अलैहि तहरीर फ़रमाते हैं- आपसे भूल वाक़ए हुई ताकि उम्मत के लिए सुन्नत बन जाये और इस लिए की अगर किसी इमाम से ऐसा वाकिया पेश आये तो उसे शर्म न आये !
🌹आपके भूलने की वजह सिर्फ यही थी कि आप का फेयल उम्मत के लिए सुन्नत बन जाये वरना आपकी उम्मत के लिए मशाइख़ दूसरों की जनाबत पर भी इत्तेला रखते हैं !
💫हज़रत याफई रहमतुल्लाह अलैही ने एक वाक़्या नक़्ल फ़रमाया की बेशक़ इमामुल हरमैन अबुल मआली इब्न इमाम अबु मुहम्मद जुवैनी एक दिन सुबह की नमाज़ के बाद बैठे दर्स दे रहे थे वहां से सूफ़िया किराम में से एक शैख़ का गुज़र हुआ उनके साथ उनके अहबाब भी थे वह किसी दावत पर जा रहे थे इमामुल हरमैन ने दिल मे ख्याल की इन लोगों का कोई और काम नही सिवाय खाने और रक़्स करने के ! वह शैख़ जब दावत से वापस लौटे तो फरमाने लगे ए फ़क़ीह तुम क्या कहते हो उस शख़्श के बारे में जो सुबह की नमाज़ हालते जनाबत में पढ़ा देता है और मस्जिद में बैठ कर उलूम का दर्स देता है और लोगों की ग़ीबत करता है ! इमामुल हरमैन को शैख़ की बात सुन कर याद आया कि मुझ पर तो ग़ुस्ल लाज़िम था लेकिन मैं भूल गया इसके बाद उनके दिल मे मशाइख़ के मुताल्लिक अच्छा एतकाद आ गया ! यानी मशाइख़ को साहिबे क़शफ समझने लगे !
*_👆🏼इस वाक़ये से यह बयान करना मक़सूद है कि जब मशाइख़ दूसरों की हालत ए जनाबत पर मुत्तला हो सकते हैं, तो हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैही वसल्लम को अपने आप पर मुत्तला होना जरूरी था ! लेकिन अल्लाह तआला ने आप को भुला कर आपकी उम्मत के लिए सुन्नत बना दिया !_*
*📚(तज़किरतुल अम्बिया, सफा 497)*
*👉🏻नोट::-* पोस्ट को खूब आम करें, बहुत अहम इल्म है साथ ही अगली पोस्ट पढे *“नबी करीम सल्लल्लाहु तआला अलैही वसल्लम का खुल्क़ कुरान, कुरान को खुल्क़ क्यों कहा ?”*



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